इंडियन पुलिस एक्ट का सच और शहीद भगत सिंह की आखिरी चेतावनी

अंग्रेजों द्वारा बनाया गया इंडियन पुलिस एक्ट

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इंडियन पुलिस एक्ट अंग्रेजों ने क्यों बनाया। अंग्रेजों ने यह कानून भारत की जनता की सुरक्षा के लिए नहीं बनाया था, बल्कि भारतीय क्रांतिकारियों को दबाने और नियंत्रित करने के लिए बनाया था। अंग्रेजों का उद्देश्य यह था कि दोबारा कोई भी भारतीय क्रांतिकारी उनके खिलाफ खड़ा न हो सके।

अंग्रेजों के आने से पहले भारत के किसी भी राजा ने पुलिस नहीं बनाई थी। उस समय सेना होती थी। सेना का काम था देश की रक्षा करना और विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ना। लेकिन अंग्रेजों ने पुलिस बनाई, जिसका काम था अपने ही देश के लोगों पर अत्याचार करना, उन्हें मारना, कुचलना और क्रांतिकारियों को खत्म करना।

पुलिस कानून की खतरनाक विशेषता

इंडियन पुलिस एक्ट में एक ऐसी बात डाली गई, जो दुनिया के किसी भी अन्य पुलिस कानून में नहीं मिलती। इस कानून के अनुसार पुलिस अधिकारी को यह अधिकार दिया गया कि वह किसी भी भारतीय पर लाठी चला सकता है, और यह उसकी ड्यूटी मानी जाएगी।

अगर कोई पुलिस वाला आपको डंडे से मार रहा है, तो कानून के अनुसार वह अपना कर्तव्य निभा रहा है। लेकिन अगर आप अपने बचाव के लिए उसका डंडा पकड़ लेते हैं, तो आपके खिलाफ केस हो सकता है कि आपने पुलिस को ड्यूटी करने से रोका। उसकी ड्यूटी क्या मानी जाएगी। आपको डंडे से मारना, आपका सिर फोड़ देना।

लाठी चार्ज और कानून का दुरुपयोग

जब भी पुलिस लाठी चार्ज करती है, तो कानून की भाषा में वह ड्यूटी कर रही होती है। अगर आप लाठी से खुद को बचाने की कोशिश करते हैं, तो यह कहा जाता है कि आपने पुलिस के कर्तव्यों में बाधा डाली।

1860 के बाद इसी कानून के आधार पर सैकड़ों भारतीय क्रांतिकारियों को लाठियों से पीट पीटकर मार दिया गया। इसी सोच के तहत अंग्रेजी सरकार ने एक और खतरनाक कानून बनाया, जिसे रॉलेट एक्ट कहा गया।

रॉलेट एक्ट और अंग्रेजी अत्याचार

रॉलेट एक्ट के तहत अंग्रेजी पुलिस को यह अधिकार दिया गया कि वह किसी भी भारतीय को बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तार कर सकती है और छह महीने तक जेल में बंद रख सकती है। न कोई सुनवाई, न कोई सफाई का मौका।

इस कानून के विरोध में लाला लाजपत राय ने लाहौर में एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला। उस जुलूस में हजारों लोग थे और उसमें शहीद ए आजम भगत सिंह भी शामिल थे। जुलूस पूरी तरह शांतिपूर्ण था।

लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज

उस शांतिपूर्ण जुलूस पर अंग्रेज अधिकारी सांडर्स ने लाठी चार्ज करवाया। सांडर्स ने खुद लाला लाजपत राय के सिर पर चौदह से ज्यादा लाठियां मारीं। इतनी जोर से मारी गईं कि उनका सिर फट गया और खून बहने लगा।

उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। लाला जी की मौत भगत सिंह के सामने हुई। जब लाला जी बेहोश होकर गिर पड़े, तो भगत सिंह ने उन्हें अपनी गोद में उठाकर अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन वे बच नहीं सके।

अंग्रेजी अदालत का फैसला और भगत सिंह की प्रतिज्ञा

लाला लाजपत राय की मौत के बाद सांडर्स के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई। लेकिन अंग्रेजी अदालत ने सांडर्स को बाइज्जत बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि सांडर्स को राइट टू ऑफेंस है, लेकिन लाला लाजपत राय को राइट टू डिफेंस नहीं है।

अदालत का मतलब साफ था। पुलिस चाहे तो किसी को मार सकती है, क्योंकि कानून उसे यह अधिकार देता है। इस फैसले के बाद भगत सिंह ने प्रण लिया कि जिस सांडर्स को अंग्रेजी कानून सजा नहीं दे सकता, उसे वह खुद सजा देंगे।

सांडर्स वध और भगत सिंह की शहादत

भगत सिंह ने अपने प्रण को पूरा किया और सांडर्स को मार दिया। इसी कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और बाद में फांसी की सजा सुनाई गई।

भगत सिंह को फांसी की सजा 24 मार्च 1931 को दी जानी थी, लेकिन अंग्रेजों ने डर के कारण एक दिन पहले ही 23 मार्च 1931 की शाम को उन्हें फांसी दे दी।

फांसी से पहले भगत सिंह का अंतिम संदेश

फांसी से पहले एक अखबार का संपादक भगत सिंह से मिलने गया। उसने पूछा कि आप फांसी पर जा रहे हैं, क्या आप कुछ कहना चाहते हैं।

भगत सिंह ने कहा कि उन्हें सिर्फ इतना कहना है कि भारत के नौजवान अपने घरों में शांत होकर न बैठें। पूरी ताकत के साथ इंडियन पुलिस एक्ट को खत्म करने का संघर्ष करें। क्योंकि जब तक यह कानून रहेगा, तब तक शहीद भगत सिंह जैसी फांसियां लगती रहेंगी।

जेल में आखिरी क्षण

जब भगत सिंह से कहा गया कि आपकी मां आपके हाथ का खाना खिलाना चाहती हैं, तो अंग्रेजों ने यह अनुमति भी नहीं दी। कहा गया कि जेल में यह संभव नहीं है। बार बार कहा गया कि यह नहीं हो सकता, यह नहीं हो सकता।

यह अंग्रेजी व्यवस्था की क्रूरता थी, जहां एक मां को अपने बेटे को आखिरी बार खाना खिलाने तक की इजाजत नहीं दी गई।

निष्कर्ष

इंडियन पुलिस एक्ट केवल एक कानून नहीं था, बल्कि यह अंग्रेजों का हथियार था, जिससे उन्होंने भारतीयों को दबाया, कुचला और डराया। शहीद भगत सिंह ने अपनी शहादत से यह संदेश दिया कि असली आजादी तब तक पूरी नहीं होती, जब तक अन्यायपूर्ण कानून खत्म नहीं होते।

उनकी आखिरी चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी।